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"पाखी न पाती / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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जीवन-मरु
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ये दो बोल तुम्हारे
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देते जीवन ।
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रिसता दर्द
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पोर-पोर से नित
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कोई न बाँटे।
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ज्ञान अपार
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कराए सागर पार
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भाव -निर्मल ।
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स्नेह-कसौटी
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निश्छल व्यवहार
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वही सद्गुरु ।
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गुरु अनेक
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परम प्रिय शिष्य
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दुर्लभ एक ।
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तमस्  हरता
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उजियारा करता
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लोभ से दूर ।
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वासना-पंक
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जो डूबे हैं आकण्ठ,
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गुरु कलंक ।
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53
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भेद जो करे
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ऐसे  गुरु  कपटी
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नरक  भरें ।
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54
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शिष्य को छले
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ऐसे गुरु से अच्छे
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सौ पापी भले ।
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मेरा संकल्प-
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ज्ञान -स्नेह बाँटना
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बने जीवन ।
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तन चन्दन
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मन हरसिंगार
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झरता प्यार । 
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स्वर्णिम रूप
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जैसे सर्दी की धूप
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लगे अनूप । 
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दिल जो मिले
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स्वर्गिक अनुभूति
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टूटे बंधन। 
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59
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पाखी न पाती
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मिलेंगे कैसे अब
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याद रुलाती । 
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तुम दर्पण
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खुद को निहारता
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उदास  मन । 
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07:43, 8 सितम्बर 2019 के समय का अवतरण

46
जीवन-मरु
ये दो बोल तुम्हारे
देते जीवन ।
47
रिसता दर्द
पोर-पोर से नित
कोई न बाँटे।
48
ज्ञान अपार
कराए सागर पार
भाव -निर्मल ।
49
स्नेह-कसौटी
निश्छल व्यवहार
वही सद्गुरु ।
50
गुरु अनेक
परम प्रिय शिष्य
दुर्लभ एक ।
51
तमस् हरता
उजियारा करता
लोभ से दूर ।
52
वासना-पंक
जो डूबे हैं आकण्ठ,
गुरु कलंक ।
53
भेद जो करे
ऐसे गुरु कपटी
नरक भरें ।
54
शिष्य को छले
ऐसे गुरु से अच्छे
सौ पापी भले ।
55
मेरा संकल्प-
ज्ञान -स्नेह बाँटना
बने जीवन ।
56
तन चन्दन
मन हरसिंगार
झरता प्यार ।
57
स्वर्णिम रूप
जैसे सर्दी की धूप
लगे अनूप ।
58
दिल जो मिले
स्वर्गिक अनुभूति
टूटे बंधन।
59
पाखी न पाती
मिलेंगे कैसे अब
याद रुलाती ।
60
तुम दर्पण
खुद को निहारता
उदास मन ।