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पाथेय / श्रीप्रकाश शुक्ल
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अनिल जनविजय (वार्ता | योगदान)ने किया हुवा 01:11, 21 अप्रैल 2009का अवतरण
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आओ
बैठो
साथ पिया
बालू के कण हैं अपने ही ।
नहीं यहाँ दुनिया का चक्कर
पलकों में पग धर आओ री
यह है रेत नदी बन भीतर
शीतलता सी उतरो री !
तट है सूना-सूना-सा
लहरों में अब उतराओ भी
जिन हलचल को अब तक बांधे
खोल उन्हें, इतराओ भी !
इतना उमड़ो इतना घुमड़ो
यह तट उभरे बन साक्षी ,जी
विरह का मारा जब भी गुज़रे
पाये पाथेय, संभाले जी !
रचनाकाल : 10.03.2008
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