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पृथ्वी-पुत्र / बसन्तजीत सिंह हरचंद

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दोपहरी है , खेतों में हल हांक रहा है ।
कर्मठ जीवन - बिम्ब कृषक का
मेरी कविता की आँखों से झाँक रहा है ।।

इसके जलते ब्रह्मांड में
दूर- दूर तक कोई शीतल छाँव नहीं है ,
कंटीली झाड़ी तक का भी नाम नहीं है ;
पद रखने को ठांव नहीं है ।
अन्तरिक्ष में दु;खों का निर्वात ताप है ,
यहाँ जलद का जल ले आना घोर पाप है ;
मिला श्राप है ।

गर्मी से , श्रम से आकुल हो
झाड़ी पर कुर्ता फैलाए

अपने सिर पर ओढ़े फटी हुई छाया को
यह लेटा है ।
अभिशापों को इसने भुजभर के भेंटा है ;
पृथ्वी के जैसा ही पृथ्वी का बेटा है ।

तुच्छ बीज इसके पांवों से कुचले - रौंदे
पाद - परस पा उगते बन जीवन के पौधे ।
इसने यौवन झोंक दिया है
श्रम को जीवन सौंप दिया है ;
इन खेतों में
इसने निज को यहाँ - वहां पर रोप दिया है ।
फिर भी निर्धनता ने इस पर कोप किया है
जलन वेदना की इन प्राणों में गहरी है ।
दोपहरी है ।।

(अग्निजा , १९७८)

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