भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पेंटिंग-3 / गुलज़ार

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:53, 30 सितम्बर 2008 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गुलज़ार }} खड़खड़ाता हुआ निकला है उफ़क से सूरज ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खड़खड़ाता हुआ निकला है उफ़क से सूरज

जैसे कीचड़ में फँसा पहिया ढकेला किसी ने

चब्बे-टब्बे-से किनारों पर नज़र आते हैं

रोज़-सा गोल नहीं

उधड़े-उधड़े-से उजाले हैं बदन पर

और चेहरे पर खरोंचे के निशान हैं