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"प्रार्थना / आकांक्षा पारे" के अवतरणों में अंतर

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06:34, 8 नवम्बर 2009 के समय का अवतरण

करती हूँ कोशिश
निकाल सकूँ मन से तुम्हें
न जाने कब
यादें बन जाती हैं तुम्हारी
ख़ुशी के गीत।

घोर निराशा के क्षण में
रीते मन के साथ
संघर्ष की पगडंडियों पर
चुभता है असफलता का कोई काँटा

अचानक उसी क्षण
जान नहीं पाती कैसे
यादें बन जाती हैं तुम्हारी
धैर्य के पल।

डबडबाई आँखों को
रखती हूँ खुला
उस पल
यादें बन जाती हैं तुम्हारी
दुख में गाई जाने वाली प्रार्थना।