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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / चतुर्दश सर्ग / पृष्ठ - ८

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हो के विभिन्न, रवि का कर, ताप त्यागे।
देवे मयंक-कर को तज माधुरी भी।
तो भी नहीं ब्रज-धरा-जन के उरों से।
उत्फुल्ल-मुर्ति मनमोहन की कढ़ेगी॥141॥

धारा वही जल वही यमुना वही है।
है कुंज-वैभव वही वन-भू वही है।
हैं पुष्प-पल्लव वही ब्रज भी वही है।
ए हैं वही न घनश्याम बिना जनाते॥142॥

कोई दुखी-जन विलोक पसीजता है।
कोई विषाद-वश रो पड़ता दिखाया।
कोई प्रबोध कर, 'है' परितोष देता।
है किन्तु सत्य हित-कारक व्यक्ति कोई॥143॥

सच्चे हितू तुम बनो ब्रज की धारा के।
ऊधो यही विनय है मुझ सेविका की।
कोई दुखी न ब्रज के जन-तुल्य होगा।
ए हैं अनाथ-सम भूरि-कृपाधिकारी॥144॥

मन्दाक्रान्ता छन्द

बातों ही में दिन गत हुआ किन्तु गोपी न ऊबीं।
वैसे ही थीं कथन करती वे व्यथायें स्वकीया।
पीछे आई पुलिन पर जो सैकड़ों गोपिकायें।
वे कष्टों को अधिकतर हो उत्सुका थीं सुनाती॥145॥

वंशस्थ छन्द

परन्तु संध्या अवलोक आगता।
मुकुन्द के बुध्दि-निधन बंधु ने।
समस्त गोपी-जन को प्रबोध दे।
समाप्त आलोचित-वृत्त को किया॥146॥

द्रुतविलम्बित छन्द

तदुपरान्त अतीव सराहना।
कर अलौकिक-पावन प्रेम की।
ब्रज-वधू-जन की कर सान्त्वना।
ब्रज-विभूषण-बंधु बिदा हुए॥147॥