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प्रेम-1 / सुशीला पुरी

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प्रेम
वक्रोक्ति नही
पर अतिश्योक्ति ज़रूर है

जहाँ
चकरघिन्नी की तरह
घूमते रहते हैं असंख्य शब्द

झूठ-मूठ के सपनों
और चुटकी भर
चैन के लिए