भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

प्रेम में बड़ी हो तुम / येव्गेनी येव्तुशेंको

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


प्रेम में बड़ी हो तुम
साहसपूर्वक खड़ी हो तुम
और मैं भीरु बड़ा हूँ
कायर-सा पीछे खड़ा हूँ
कुछ बुरा तुम्हारा नहीं करूंगा
पर भला भी करते डरूंगा

मुझे हमेशा लगता है यह
घने जंगल में भी तुम
ढूँढ लोगी मुझे सहज ही
मैं जब हो जाऊंगा गुम

जिस जगह हम हैं खड़े
यहाँ उगे हैं फूल घने
मैं नहीं जानता क्या नाम है इनका
कौन से हैं ये फूल
अब काम नहीं आते कौशल
लगे है ऎसा, सब गया मैं भूल
मैं भूल गया
क्या करूँ और कैसे?
हैं कितने पुरूष और मुझ जैसे?

तुम थक गई हो
हाथ मांग रही हो मेरा
पास रहना चाहती हो
साथ मांग रही हो मेरा

और अब तुम मेरे हाथों में हो
गुम अपनी ही बातों में हो--
"देखो, देखो जरा!
कितना नीला है आसमान
सुनो, सुनो तो!
जंगल में कैसे पक्षी करते हैं गान...
अरे, अरे भई! यह क्या बात हुई
चलो उठाओ
उठाओ मुझे फिर गोद में
चलो, ले चलो मुझे उठाकर
हाँ, यह सौगात हुई..."

पर मेरे सामने समस्या है एक
कहाँ ले जाऊँ तुम्हें उठाकर
सहेली मेरी नेक

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय