भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

फूल खिले बेला के / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:08, 12 अप्रैल 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण' |अनुव...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सखि, फूल खिले बेला के, तुम मुसकाओ।
यह रात मखनियाँ, है चाँदनी रुपहली,
कजरी के कच्चे दूध-फेन-सी उजली,
है ठंडी-मीठी, -केले के शरबत-सी,
सुन लेगा कोई-चूड़ी मत खनकाओ!

फिर नहीं आज सी रात कभी मिलने की,
बगिया भी ऐसी कभी न फिर खिलने की,
मैं गूँथूँ कलियाँ काजल-से कुन्तल में-
तुम अनजाने अपना अँचरा खिसकाओ!

तुम मुझे देखतीं मिदुराए नयनों से,
चिहुँकाती हीरक-लौंग कान्त-किरणों से-
यों बैठो, छाँह सुहागिन इन कलिया की-
लोने कपोल पर फिसले-नहीं लजाओ!

मन आज हमारे सिरस-सुमन-से हल्के,
चन्दा पर ज्यों टुकड़े-बरसे-बादल के!
है धरा आज इन पाँवों को पथरीली-
लो उड़ें गगन में, काटें रात नशीली!

मैं बना करधनी तारों की पहनाऊँ-
तुम पौढ़ चाँद पर, शिथिल-वसन अलसाओ!
सखि, फूल खिले बेला के, तुम मुसकाओ!