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बंगाल-2 / कुमार अनुपम
Kavita Kosh से
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मैं सूर्यास्त शब्द को काट
कविता को ठीक करना चाहता हूँ – विनोद कुमार शुक्ल
मेरे क़स्बे मे जब उतरा था दल मूर्तिकारों का
मैंने बंगाल को सुना था
दीघा के तट पर
देखा मैंने बंगाल
को उगते हुए देखा
हावड़ा के झूले पर
झुले पर हावड़ा को झूलते हुए
भरते हुए पेंग की साँस
शांतिनिकेतन नन्दनपैलेस
मालदह वर्धमान
रोमांचित व्यस्त बंगाल
बंगाल मस्त बंगाल
देखा
नावों के नारंगी मस्तूल-सा
ज़ोर पर हवा के मुड़ता हुआ बंगाल
दिल्ली गुजरात मुम्बई
और जाने कहाँ की रेलों में
लुकता हुआ भागता हुआ
अस्त होता हुआ डायमंडहार्बर पर
सोनागाछी पर नष्ट होता हुआ बंगाल
देर रात
सुना न जाता था
समुद्र का छाती पीट पीट कर चीखना –
बं गा ल….. बं गा ल
बं गा ल….. बं गा ल