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बचपन / कल्पना लालजी

कैसे भूलू बचपन की यादों को मैं
कहाँ उठा कर रखूं किसको दिखलाऊँ
संजो रखी है कब से कहीं बिखर न जाए
अतीत की गठरी कहीं ठिठर न जाये
पिछवाड़े के आले में जो गुडिया बैठी है
फीके पड़ गए रंग अकड अब भी वैसी है
लकड़ी का घोडा सिंहासन था जो मेरा
स्टोर के कोने में सोया पड़ा है
पहरेदार जो था घर का कभी
सालों से अब भी वहीँ खड़ा है
गलियारों में खिलखिलाकर गूंजती
हंसी मानों अब भी है बरसती
ठिठुरती हुई सर्दी की रातों में
चट होती मूंगफली बातों ही बातों में
लिहाफ से आज भी वही खुशबू आती है
खींचातानी उसकी अब भी गाती है
और न जाने ऐसी कितनी चीजें
आज तन्हा हो गईं हैं
खो गए हैं साथी उनके अनजाने मोडों पर
पगडंडियाँ आज भी वहीँ खडीं हैं