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"बहिनें आँखें / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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पार हम करेंगे
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तुम हो चन्दा
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मेरी रागिनी हो ।
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बन शीतल किया
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वरदान  हमको
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घिरा था तम
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तुम आ गए
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राह में दीया बन,
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कब भारी लगती
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पाखी को पाँखें ।
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समान मन
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झेलेंगे सब गम
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हम ना कम।
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आँख जो खुली
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विहँसी आँगन में
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धुली चाँदनी ।
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जब मुझे निहारा
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फैला उजास
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किलोंले करे
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दीप -शिखा आँगन
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उजाला भरे ।
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नदिया भरे
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धरा से नभ तक
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उजाला बहे ।
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अजाना पथ
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बढ़े चलो दीप ले
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अपना रथ ।
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हर दौर में
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तुम्हारी मुश्किल में
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सदा पहने
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उदासी के गहने
 +
उतारो इन्हें
  
 
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04:34, 19 मई 2019 के समय का अवतरण

 161
बोझिल मन
 खोजते तुमको ये
धरा -गगन
 162
कली ये खिली
 हल्की प्रेम-फुहार
 जब थी मिली ।
 163
धड़कन हो
 मन की शीतलता ,
 व चन्दन हो ।
 164
अँधेरी खाई
पार हम करेंगे
प्रेम भरेंगे ।
165
तुम हो चन्दा
 मधुर चाँदनी हो
मेरी रागिनी हो ।
166
रिश्तों से परे
सोता प्रेम-मधु का
सदा ही झरे ।
167
 तपती धरा
दहकता गगन
आकुल मन
168
पुरवा हवा
बन शीतल किया
मेरा जीवन।
169
देगे प्रभु जो
वरदान हमको
माँगेंगे तुम्हें ।
17 0
घिरा था तम
यहाँ से वहाँ तक
भटके हम ।
171
तुम आ गए
राह में दीया बन,
हमें भा गए ।
172
बहिने आँखें
कब भारी लगती
पाखी को पाँखें ।
173
समान मन
झेलेंगे सब गम
हम ना कम।
174
आँख जो खुली
विहँसी आँगन में
धुली चाँदनी ।
175
नैन -कोर से
जब मुझे निहारा
फैला उजास
176
किलोंले करे
दीप -शिखा आँगन
उजाला भरे ।
177
नदिया भरे
धरा से नभ तक
उजाला बहे ।
178
अजाना पथ
बढ़े चलो दीप ले
अपना रथ ।
179
 हर दौर में
 तुम्हारी मुश्किल में
 रहें दिल में
180
सदा पहने
उदासी के गहने
उतारो इन्हें