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बहुत दिन के बाद / उर्मिल सत्यभूषण

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अनवरत युद्धों के बाद
जब देह शत सहस्र
जख़्मों से क्षत-विक्षत हो जायेगी
जिजीवषा थक जायेगी
आत्मा निकलने को बेचैन
हो उठेगी
तो अपनी थाती सौंप देना वंशजों को
अपना कवच,
तलवार, ढाल, कृपाण
संजोये हुये अस्त्र-शस्त्र
तमगे, उपलब्धियाँ
लफ़्जो के कागज़ी गुलदस्ते
उनके हवाले कर देना
उनके पुख्ता किये
कंधों पर डाल कर बोझ
अपनी देह की कम्बली
उतार देना चुपचाप
पर अभी नहीं
बहुत दिन के बाद।