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बाज़ारवाद / परितोष कुमार 'पीयूष'

सत्ता की पीठ पर बैठा बाज़ारवाद
देखो किस प्रकार राक्षसी हँसी हँस रहा
प्रवेश कर तुम्हारे ही घर और समाज में
तुमसे ही छीन ली है तुम्हारी सारी संवेदनाएँ
और तोड़ दिए हैं समस्त मानवीय रिश्तों को
तार-तार कर तुम्हारी सभ्यता की शालीनता
बेच दी है तुम्हें और तुम्हारी विराद्री को नग्नता

तुमपर हावी होता यह बाज़ारवाद
बहलाकर तुम्हें प्रलोभनों में
तुम्हारे ही सौदे कर रहा
तुम्हारे हाथों

क्या तुम उस हँसी में छुपे
कुत्सित बिम्बों को नहीं देख पा रहे
या उसकी चकाचौंध ने
तुम्हें अंधा बना दिया है

आज तुम्हें आगे बढ़कर
सदी के इस कराहते समय में
बहिष्कार करना होगा बाज़ारवाद का
उसकी जड़ों को उखाड़ फेंकना होगा

ताकि
बचा रहे समाज
बची रहे संवेदनाएँ
सुरक्षित रहे तुम्हारी पीढ़ियाँ

वरना एक दिन
अट्ठहास करता यह बाज़ारवाद
तुम्हें तब्दील कर देगा
प्लास्टिक के पुतलों में

और तुम्हारे अंगों की
तस्करी कर
तुम्हारी सांसों के भी सौदे कर देगा
तुम्हारे हाथों