भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बात मगर बाकी रहे / शीन काफ़ निज़ाम

Kavita Kosh से
Shrddha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:06, 10 जनवरी 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=शीन काफ़ निज़ाम |संग्रह=सायों के साए में / शीन का…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

साहिबों
देखते हो
रात अभी बाक़ी है
और अगर रात नहीं बाक़ी तो
हम बाक़ी हैं
कितने गम कितने आलम कितने ही यादों के मकाँ
जिन में आबाद हैं हम सब के मिटे नामो निशाँ
वहमों गुमाँ

रात की राख से कब किश्ते आलम कटती है
दूधिया दुःख है वो पैगामे मुसर्रत कब है
और पैगामे मुसर्रत भी मुसर्रत कब है
साहिबों
रात का क्या
आज अगर ख़तम न होगी वो कभी तो होगी
रात से रात निकलती है न निकलेगी कभी
बात से बात निकलती है
चली जाती है
रात बाक़ी न रहे बात मगर बाक़ी रहे
बात बाक़ी है तो हम लोग सभी बाक़ी है