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बिखराव / सुधा ओम ढींगरा

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अक्सर
मेरी हथेली पकड़
अपनी हथेली फैला
लकीरों को मिलाते--क्यों मुस्कराये थे....

दिमाग़, दिल, उम्र
सब लकीरें तो मिलती हैं
बिल्कुल मेरी लकीरों से
संयोग की बात कह-- क्यों शर्माये थे....

छत्तीस के छत्तीस ग्रह मिलते हैं
जन्म कुण्डलियाँ मिला
बड़े तार्किक ढंग में
उछल कर खुशी से--क्यों चिल्लाये थे.....

ग्रह मिले, लकीरें मिलीं
दिल भी मिल जाएँगे
भाग्य के द्वार खुल जाएँगे
स्वयं ही प्रसन्न हो तुम--क्यों सकुचाये थे....
 
मेरी खामोशी की उपेक्षा
दिल की अवज्ञा कर
पुरखों का इतिहास दुहरा
मेरी सोच को प्रभावित कर--क्यों गर्वाये थे....

दादी -नानी की निभी शादियाँ
ग्रहों की महत्ता, परम्पराएँ
प्रेम-विवाह से टूटे परिवार
उँगलियों पर गिना तुम--क्यों तन्नाये थे.....

सामाजिक मर्यादा
खानदानी संस्कारों में बंधी
स्वीकृति की मोहर लगा
घबराई सी मैं, तुम--क्यों हिचकिचाये थे....

लकीरें मिलीं, ग्रह भी मिलें
दिल न मिल सकें
मैं औ' तुम--हम न हुए
प्रश्न मेरे पर तुम-- क्यों तमतमाये थे....

दिल, लकीरों, ग्रहों से परे हैं
जब ये मिलते हैं
तो तक़दीर भी बदल जाती है
ऐसा सुन, तुम--क्यों बौखलाये थे.....

तद़बीर-तक़दीर बदलना चाहती है
ग्रहों, लकीरों से ऊपर
सोचना चाहती है
स्वीकार न कर तुम--क्यों हकलाये थे......

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