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बीते सभी पल याद आये / सुनीत बाजपेयी

कल गया जब मैं बहुत दिन बाद अपने गाँव फिर से,
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल याद आये।

किन्तु अबके बार था बदला हुआ हर इक नजारा।
शान्ति थी पहले वहाँ पर शोरगुल है ढेर सारा।
खेलते थे हम जहाँ छप्पर पुराना ढह गया है,
सूख कर सिमटा दिखा बड़की तलैया का किनारा।
नीम घर के सामने वाला भले ही कट चुका पर,
हो गए हैं अब बड़े वो पेड़ जो तुमने लगाये।
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल आये।

बाग़ में भी क्या बताऊँ इस दफा मुश्किल बड़ी थी।
तुम नहीं थीं साथ पर बरात यादों की खड़ी थी।
बैठ कर घंटों जहाँ हम प्रेम की पींगें बढ़ाते,
उस जगह पर लाश उन लम्हात की बिखरी पड़ी थी।
याद है तुमको, खिलाता था स्वयं ही तोड़कर के,
कल उसी जामुन तले रोते रहे फिर लौट आये।
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल याद आये।

वो गली जिसमें बना था घर तुम्हारा और मेरा।
सिर्फ सन्नाटा मिला डाले वहाँ अपना बसेरा।
पास जीने के बना कमरा व्यथित होकर मिला कल,
शाम को मिलते जहाँ हम रोज होने पर अँधेरा।
आज तक समझा नहीं ये मैं गया छत पर कभी जब,
आ गयीं हर बार ऊपर किस तरह तुम बिन बुलाये।
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल याद आये।