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भादों की अँधेरी, झकझोर / गढ़वाली

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

भादों की अँधेरी, झकझोर[1]
ना बास ना बास, पापी मोर।
डुलदो[2] तू क्यों, पापी प्राणी।
स्वामी बिना मैक, बड़ी खडरी[3]
विश्वासी मन जो, औंद भारी।
भादों की बरसात जग रूझ[4]
मन की मेरो ना, आग बुझ।
स्वामी बिना झूठी, लाणीं खांणी[5]
मनु की मनुमा, रई गांणी[6]

शब्दार्थ
  1. बहुत
  2. कांपना
  3. दुख
  4. जग भीग गया
  5. खाना लाना
  6. इच्छा