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भावों की चिंगारी / अलेक्सान्दर पूश्किन / हरिवंश राय बच्चन

जारजियन<ref>कोहकाफ़ पहाड़ी प्रदेश में जार्ज़िया नामक इलाका</ref> गिरि पर है रजनी अपनी चादर फैलाती,
मेरे मन को बहलाने को मन्द-मधुर सरिता गाती;
औ’ मेरी पलकों के ऊपर दुख की बदली घिर आती,
आँखों में तुम, इससे उनकी ज्योति नहीं घटने पाती ।

आँखों में तुम, अन्तर में तुम, पीड़ा तो अवगुण्ठन है,
शान्त बना रखा इस पीड़ा ने जगती का क्रन्दन है ।
दिल के अन्दर जब तक उठती है भावों की चिंगारी,
प्यार करेगा, क्षार बनेगा ! देखो उसकी लाचारी !

अँग्रेज़ी से अनुवाद : हरिवंश राय बच्चन

शब्दार्थ
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