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"भाषा में छिप जाना स्त्री का / कात्यायनी" के अवतरणों में अंतर

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न जाने क्या सूझा
 
न जाने क्या सूझा

23:33, 15 अक्टूबर 2015 के समय का अवतरण

न जाने क्या सूझा
एक दिन स्त्री को
खेल-खेल में भागती हुई
भाषा में समा गई
छिपकर बैठ गई।

उस दिन
तानाशाहों को
नींद नहीं आई रात भर।

उस दिन
खेल न सके कविगण
अग्निपिण्ड के मानिंद
तपते शब्दों से।

भाषा चुप रही सारी रात।

रुद्रवीणा पर
कोई प्रचण्ड राग बजता रहा।

केवल बच्चे
निर्भीक
गलियों में खेलते रहे।