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भूख / उर्मिल सत्यभूषण

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तुम, जो भूख की बातें किया करते हो
तुम, जो कल्पना के पर्दों पर
भूख के चित्र उकेरा करते हो
तुमने भूख देखी है क्या?
भूख-पेट की हो या जिस्म की
अथवा आत्मा की
आदमी को बेचैन कर देती है
मजबूर कर देती है
वह सब करने को
जो शोभा नहीं देता भद्रजनों को
सभ्यता के लबादे उतार कर
आदिम लिबास में आदमी
जंगली हो जाता है
जंगल सा स्वच्छंद
उच्छृंखल, पागल
लावारिस कुत्ते सा
मंुह मारता है घूरे के ढेर में
पेट की आग बुझाने के लिये
गोबर से दाने बीनता है
साहब की कोठी पर बैठकर
चुसे हुये आम चूसता है।
सच! बिल्कुल
आवारा कुत्तों की तरह
छीन झपट कर चबर-चबरकर
चबा जाता है जूठे छिलके
मैंने देखा है यह सब
अपनी आंखों से देखा है
तुमने देखा है?
जिस्म के भूखे आदमी को
चीते की तरह दबोचते
देखा है अपने शिकार को
एक कविता जिस्म को
अपनी गिरफ्त में
जकड़ते हुये
मांसपिंड को नोच-नोच
कर खाते हुये।
गंदे चहबच्चों में
सड़ी-गली नालियों में
लार टपकाते हुये पाना
कितनी जुगुप्सा जगाता है
आदमी हवस में पागल हो जाता है
होश आता है तो अपनी नज़र
में गिर जाता है
तुमने जाना है इसे?
अपने तिलिस्म से बाहर आओ
देखो, भूख क्या होती है
और जब भूख आत्मा की हो
तो यह मन प्राण में
रक्त के कण-कण में
जिस्म के पोर-पोर में
आग-सी सुलगती है,
दहकती है
फिर कभी-कभी फट पड़ती है
लावा बनकर
क्रोध, आक्रोश व आवेश
के रूप में अनाचार व अत्याचार के विरुद्ध
ज्वालामुखी के दहने
से फूटती लपटें
क्रांति को जन्म देती है
बगावत खड़ी कर देती हैं
आदम के बच्चे को
सूली पर चढ़ा देती है
शहीदों का शीश फूल बन जाती है।
सच! मैंने देखी है यह भूख भी
शिद्धत से महसूस की है
मेरी तेरी छाती पर
दुःसह बोझ सी लदी,
मेरी तेरी आंखों में
प्रश्न चिन्हों सी टंगी
यह भूख तड़पा रही है हमें
आओ, अपने तिलिस्म
से बाहर आओ, देखो
यह भूख अतृप्त क्यों है?
आओ आपरेशन करके
देखें, उस व्यवस्था का
कि कहाँ है नासूर
जो जन्म देता है भूख को
सतत वेदना को
दारुण व्यथा को।