Last modified on 21 जुलाई 2016, at 23:05

भैरवी / शब्द प्रकाश / धरनीदास

1.

पथिक! काह कहत अबेर! टेक!
दिवस लम्बित दूर पथ अति चैतु चितहिँ सवेर॥
तोरि कुल परिवार नातो धरको धंधा त्याअग। आरे आ मन आलसी जड़, अजहुँ देखु न जागि॥
संग करिले संत जनको, कपट कापड़ धोय। संत के सामर्थ्य मग चढ़ि, जरा मरन न होय॥
जिन गहो जगदीश को व्रत, सोइ जगमेँ शूर। धरनिदास विलास सतभो, जिन मिले गुरूपुर॥

2.

मनहू काह फिरत भुलान। टेक।
आपु घर की सुधि न आवै, आपु फिरत भुलान। आपु ते परिचय भई तब आपही ठहरान॥
काहि करिये आपनो हित, काहि करिय वेगान। कहिसाँ कछु जाँचि लीजै, काहि दीजै दान॥
काहि कहिये कहि सुनिये, काहि लीजै ज्ञान। गावते पढते वनै नहि, पूजते कछु आन॥
काँह रहिये काँ जइये, काहि धरिये ध्यान। दास धरनी मगन होई रहु, देखि गगन निशान॥2॥