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भ्रम / उषारानी राव

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सनसनाहट की आवाज़
के साथ
रोशनी बढ़ती गई
पंचलाइट की रेशमी थैली में !
और सामने आती गई
अंधेरे की अस्मिता !
अनबूझे आयाम
अज्ञान के
अंधविश्वास के
जात-पात के
वर्ग- बोध के
बत्ती के पास उड़ता कीड़ा
उसके साथ सटकर
झुलस गया था !
कहीं बद्धमौन था
कहीं अवसाद भी !
पीढ़ियों एवं समय के
बीच घटित संघर्ष
प्रकाश के घेरे में चुप!
सवाल किया मेरे अंतस ने !
आदमी की शक्ति या कमज़ोरी मानें इसे ?
भ्रम की सृष्टि कर रहें वो
जो बचा के दामन निकल
रहें हैं
तेज़ बिकने वाला एक सौदा है
भ्रम !