भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मकान मालिक का गीत / के० सच्चिदानंदन

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:28, 13 जुलाई 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=के० सच्चिदानंदन |संग्रह= }} <Poem> मिट्टी, लकड़ी, पत्...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मिट्टी, लकड़ी, पत्थर और कर्ज़ से
मैंने बनाया एक मकान
बारिश में धुल गए पत्थर, मिट्टी
दीमक खा गए लकड़ी सारी
फिर बचा सिर्फ़ कर्ज़ा
अब जीता हूँ मैं उसे चुकाने को


अनुवाद : राजेन्द्र धोड़पकर