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मचिया बइठल तुहूँ सासु, त सुनहऽ बचन मोरा हे / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मचिया बइठल तुहूँ सासु, त सुनहऽ बचन मोरा हे।
सासु, सपन देखलूँ अजगूत,<ref>अजीब</ref> बालक एक सुन्नर<ref>सुन्दर</ref> हे॥1॥
चुप रहुँ चुप रहुँ, पुतहू,<ref>पतोहू, बधू</ref> त सुनहऽ बचन मोरा हे।
पुतहू सुनि पइँहें गँमवा<ref>गाँव</ref> के लोग करतइ उपहाँस तोरो हे॥2॥
आज हकइ सोने के रात, बबुआ एक जलम लेता हे।
पुतहू, आज चानी केरा रात, होरिलवा जलम लेता हे॥3॥
घड़ी रात बीतल पहर रात, अउरी अधिए<ref>आधी</ref> रात हे।
ललना, जलम लिहल नंदलाल, महल उठे सोहर हे॥4॥
सासु मोरा उठलन गवइत, ननद बजइवत हे।
ललना, सामीजी त मालिन फुलवरिया, मालिन सँग सारी<ref>जुआसार, जुआ</ref> खेलथ हे॥5॥
ऐहो एहो राजा दुलरइता राजा, सुनहऽ बचन मोरा हे।
राजा, तोहरा के भेलो नंदलाल, महल उठे सोहर हे॥6॥
पसवा<ref>चौसर के खेलवाला पासा</ref> त गिरलइ बेल तर, कउरिया<ref>कौड़ी</ref> बबूर तर हे।
राजा, चलि भेलन अपन महलिया, महल उठे सोहर हे॥7॥
कोठे चढ़ि देखथिन दुलरइतिन, झर रे झरोखे लगी हे।
चेरिया, आज रे उजाड़ी देहीं बगिया, त फूल छितराइ<ref>तितर-बितर</ref> देहीं हे॥8॥
महल में जुमलइ<ref>पहुँच गई</ref> मलिनियाँ, त कर जोड़ी खाड़ा भेलइ हे।
रानी, काहे लागी उजड़हइ बगिया, त काहे लागी फूल छितरहइ हे॥9॥
काहे लागी बाँधहहु मलिया, त काहे लागी लोर-झोर<ref>आँसू और झगड़ा</ref> हे।
रानी, बरजहु अपन कोठीवाल,<ref>कोठी की रक्षा करने वाले प्यादे</ref> बगिया मत सून<ref>सूना, उजाड़ना</ref> करूँ हे॥10॥
मैं तोरा पूछूँ मलिनियाँ, त सुनहऽ बचन मोरा गे।
मालिन, कइसे कइसे कयलें बिलास, मोरा के समुझाय देंही गे॥11॥
रसे-रसे<ref>धीरे-धीरे</ref> बेनियाँ<ref>छोटा पंखा</ref> डोलौलूँ, आउ<ref>और</ref> फूल छितराउलूँ हे।
रानी, भउँरे<ref>भ्रमर</ref> रूपे राजा उहाँ<ref>उस जगह</ref> गेलन, सभे रस चूसि लेलन हे॥12॥

शब्दार्थ
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