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मजूरिन / सुरेश विमल

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छप्पर समूहों से उठता हुआ
चूल्हों का धुआं...
ओस भरी खपरैलों पर
उछलते काग...
माटी के बर्तन में खदबदाता
चने का साग...

निराई पर जाने की
तैयारी में जुटी
एक पूरी बस्ती
खेतिहर मजूरों की...

खेत की मेड़ पर बिलबिलाते
बालक से बेपरवाह
लहंगे का एक कोना
कमर में खोंसे
उखाड़ती है खरपतवार...

चार कौर में निगल कर
ज्वार-बाजरी के दो टुकड़े
जी भर पानी पीती है
मजूरिन...

तेज़ हवा के झोंकों से
हिलते हैं गेहूँ, जौ के पौधे
सुग्गे की चोंच रह-रह कर
बाहर निकलती है
नीम के कोटर से...

गट्ठर बनते जाते हैं
हरी-हरी घास के
ख़ुश हैं मजूरिन
सिवा इस चिंता कर
कि कौन उचायेगा
आख़िरी वाली का गट्ठर...

कमर पर बालक को धरे
पसीने की महक उड़ाती
उम्मीद के लम्बे-लम्बे डग भरती
आएगी बस्ती में जब
वह सांवली देह...

और चौड़ी आंखों वाली मजूरिन
आवाज़ लगाएगी मेरी माँ को
मेरे घर के आगे रुक कर
और माँ...
'बस इत्ती-सी घास?'
की टिप्पणी के साथ
अठन्नी पकड़ाएगी उसे...

थोड़े असंतोष के बाद
पल्लू से बाँध कर
बहुत जतन से वह अठन्नी
चली जाएगी अपने घर मजूरिन...

जस्ते का एक मैला
बेडौल कटोरा लिए
घूंघट में हाज़िर होगी फिर
एक नियत दुकान पर वह...

अठन्नी थमाकर
बूढ़े दुकानदार को
मांगेगी
चार आने का तेल
चार आने की मिर्च
चार आने का गुड़
और चार आने का नमक...

महीनों से देखता हूँ रोज़
यही सिलसिला
देखता हूँ कि हमेशा
एक हरी लूगड़ी और लाल लहँगा
होता है मजूरिन की देह पर
ठीक वैसे ही
जैसे अजायब घर में बने
मजूरिन के एक
बुत पर टँगे हैं...

रोज़ सुबह
झुंड में चहचहाते हुए
निकलती है जब घर से
चुग्गे की तलाश में जाती
अपने नींड़ की
गोरैया लगती है
मजूरिन।