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मत समझो बच्ची / गिरीश पंकज

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मत समझो मुझको तुम बच्ची,
करती हूँ मैं बातें अच्छी ।

काम करूँ मैं पढ़ने का,
सोचूँ आगे बढ़ने का ।
झूठ नहीं, मैं बोलूँ सच्ची ।
मत समझो मुझको तुम बच्ची ।

बन्द करो न मुझको घर में,
जाऊँगी मैं दुनिया भर में ।
कौन बोलता, मुझकों कच्ची ।

मत समझो मुझको तुम बच्ची,
करती हूँ मैं बातें अच्छी ।