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मधुर आग जल गई / सच्चिदानंद प्रेमी

मधुर आग जल गई!
वासना अतृप्त बैठ-
           जिंदगी को छल गई!
बस गए महल प्रदिप्त-
अदिप्त देख झोपड़ी,
लुटे प्रसन्न मौन मन-
गंध पा सिसक पड़ी ;
पूर्णिमा वसंत की-
आस मौन वर्तिका-
                होलिका में जल गई!
                 मधुर आग जल गई!
न स्वाद मोद दे सकीं
हरी अनेक सब्जियाँ,
न सिद्ध हो सकीं भला कि
सूक्ष्म-स्थूल रोटियाँ;
कलह देख भाग्य पर-
अपर्व सानुराग मौन-
               क्षुधा अमूर्त टल गई!
                मधुर आग जल गई!
विलख रहे हैं बाल-वृन्द
झाल-ढोल-मंजिरा,
उमंग राग-रंग है-
निशा-दिवा है बेसुरा ;
   दरिद्रता निकल गई!
    पीर सुपाषाणवत-
             उमर विक्षुब्ध ढल गई!
                मधुर आग जल गई!