भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मन्थरा का उल्लसित विलाप / उज्ज्वल भट्टाचार्य

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:53, 18 नवम्बर 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=उज्ज्वल भट्टाचार्य |अनुवादक= |सं...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पीटो, और पीटो ! 
बुढ़िया हो गई हूँ, 
एक अरसे से किसी ने पीटा नहीं ।

राजपुत्र, तुम्हें क्या पता, 
इस रनिवास में क्या-क्या होता रहता है । 
दवा बनकर दर्द ऊब से उबरने देता है । 
पीट-पीटकर तुम्हारे हाथ ही थक जाएँगे । 
अकेले कमरे में अपने घावों को सहलाते हुए 
कुछ देर के लिए 
मैं जवानी के दिनों में लौट जाऊँगी । 

हर चोट मुझे बताएगी 
वह चोट मेरी नहीं 
कैकेयी की है, 
जिसे पीटना 
तुम्हारी मर्यादा के विपरीत होता । 

हाँ-हाँ, 
पीटो, और पीटो ! 
एक अरसे के बाद 
मुझे छू रहे हैं 
राजघराने के हाथ ।