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महानगर / हरिवंशराय बच्चन

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महानगर यह

महाराक्षस की आँतों-सा

फैला-छिछड़ा

दूर-दूर तक, दसों दिशा में,

ऐंड़ा-बैंड़ा, उलझा-पुलझा;

पथों, मार्गों, सड़कों, गलियों,

उप-गलियों, कोलियों, कूचों की भूल-भुलैया,

जिनमें, जिन पर मवेशियों से लेकर

लेमूशीनों तक की-

सब प्रकार तक की- सवारियों की हरकत, भगदड़।

रेंक गधों की, घोड़ों की हिनहिनी,

टुनटुनी सायकिलों की,

हॉर्न ट्रकों, लॉरियों, बसों की,

पों-कर-पों मोटर कारों की

इंसानों के शोर-शड़प्‍पे, हो-हल्‍ले से

होड़ लगाती।

झुग्‍गी-झोड़‍ियों, घर फ्लैटों,

बँगलों-आकाशी महलों, दूकान, दरीबों,

कचहरियों, दरबार, दफ़्तरों,

और कोटलों और होटलों में

जीवन के सौ जंजालों,

लेन-देन, छीनाझपटी, चालों-काटों,

बहसों, हिदायतों, शिकायतों,

सरकारी कारगुजा़री, भ्रष्‍टाचारी,

टंकन-यंत्रों, शासन तंत्रों,

तफ़रीहों, छूरी-काँटों, प्‍याली-प्‍लेटों,

बोतलों-गिलासों की गहमागहमी

भीषण गहमागहमी

भीषण हलचल है, चहल-पहल है।


दाँते ने

जो नरक किया था कल्पित

उस पर लिखा हुया था-

'इसके अंदर आने वालों,

अपनी सब आशाएँ छोड़ों।'

महानगर के महा द्वार पर

लिखा हुया है-

'इसके अंदर आने वालों,

सबसे पहले

अपनी मानवता छोड़ो।

बाद किसी संस्‍था, समाज दल, संघ, मंच से

कारबार, अख़बार, मलखा़ने, दफ़्तर से

नाता जोड़ों;

और नागरिक सफल अगर बनना चाहो,

अपनत्‍व मिटाओ;

अभिनय करना सीखो

औ' भूमिका जहाँ, जब, जैसी बैठे,

उसे निभाओ।'


महानगर यह महामंच है;

असफल होने यहाँ नहीं कोई आया है;

सिद्ध‍ि, समृद्धि, सफलता का हरेक अभिलाषी,

ईर्ष्‍या-प्रेरित अपने सहकर्मी, सहयोगी, समकक्षी से;

यहाँ न रिश्‍ता,

यहाँ न नाता,

औ' न मिताई,

भाई-बंदी,

यहाँ एक है सिर्फ दूसरे का प्रतिद्वंदी।

सब लोगों ने अभिनय करना सीख लिया है।

प्राप्‍त कुश्‍लता और दक्षता ऐसी कर ली कुछ लोगों ने,

अदा भूमिकाएँ कर सकते कई साथ ही,

भाँति-भाँति के लगा मुखौटे।

अभी शाक्‍त हैं, अभी शैव हैं, अभी वैष्‍णव;

परम प्रवीण-धुरीण कला में नेता, व्‍यापारी, अधिकारी।

ख़सम मसरकर सत्‍ती होनेवाली नारी,

कथा रही हो,

महानगर की नारी मातम में शामिल हो,

श्‍वेत वसन में,

अश्रु बहाकर, हाय, हाय कर

पल में साड़ी बदल ब्‍याह में शिरकत करती,-रँगी- चुँगी-

खिल-क्षिल हँसती।


आडंबर, उपचार, दिखावा

ऊपर-ऊपर होता रहता,

नीचे-नीचे चाकू लता, कैंची चलती,

और किसी का पत्‍ता कटता,
और किसी की पूँजी कटती।


महानगर में मानवता छोड़नी नहीं पड़ती

ख़ुद-ब-ख़ुद छूट जाती है।

धनी वर्ग कर हृदय टटोलो,

उसकी छाती सोने-चाँदी-सी ठस-ठंडी,

किसी बात से,

किसी घात से,

क्‍यों पिघलेगी।

पंच प्राण की जगह

पाँच सिक्‍के अटके हों

तो इस पर मत अचरज करना

मध्‍यवर्ग को जीने का संघर्ष

व्‍यस्‍त इतना रखता है,

लस्‍त-पस्‍त इतना कर देता,

दम रहता नहीं दूसरे को देखे भी;

स्‍वार्थ्‍ नहीं, कमजोरी उसकी

लाचारी है।

औ' दरिद्रता निम्‍नवर्ग की।

पशुता के अति निम्‍न धरातल से

उसको जकड़े रहती है,

कुछ उसके अतिरिक्‍त कहीं, वह नहीं जानता।


शेष भाग शीघ्र ही टंकित कर दिया जाएगा।