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"माँगना तुम्हीं / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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तोड़ी न कोई कली
 
तोड़ी न कोई कली
 
क्या यही ग़ुनाह था!
 
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नीलम नभ
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धुँआँ पीकर मरा
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साँस-साँस अटकी
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हम न जागे
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हरित वसुंधरा
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द्रौपदी बना लूटी।
  
 
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23:00, 12 सितम्बर 2019 का अवतरण

57
नत है शीश
करता हूँ वंदन
तेरा ही सुख माँगूँ ,
प्रतिपल मैं
करूँ हित चिंतन
साँसों में बसाकर।
58
रंग या रूप
यौवन की ये धूप
माना सब नश्वर,
मन के भाव-
न आयु -लिंग भेद
गङ्गा नहाके आए।
59
कुछ न करो
कभी पल दो पल
करो जो सुमिरन,
माँगना तुम्हीं
मिलन का प्रभात
सुख के दिन-रात।
60
लौटना कभी
किस गाँव की गली
मुझे पता ही नहीं
मैं बनजारा
मेरा न कोई गाँव
घर-द्वार भी नहीं।
61
उजाड़ वन
हमने बसाए थे,
फूल भी खिलाए थे
भूलके कभी
तोड़ी न कोई कली
क्या यही ग़ुनाह था!
62
नीलम नभ
धुँआँ पीकर मरा
साँस-साँस अटकी
हम न जागे
हरित वसुंधरा
द्रौपदी बना लूटी।