भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

माछा पकड़ माछा पकड़ डौंका / ओम प्रकाश सेमवाल

Kavita Kosh से
Abhishek Amber (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:05, 10 मार्च 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ओम प्रकाश सेमवाल }} {{KKCatGadhwaliRachna}} <poem> ये ...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ये डांडा रिक्ख लग्यूं वै डांडा बाघ
तेरा गौं बंदरों डौर मेरा गौं मा स्याळ
रौल्यूं सुंगूर सौला बैठ्यां छां दोब
जै की च पौंछ राजा तलक वैकि मौज
माछा पकड़ माछा पकड़ डौंका
हाल बुरा छिन हमरा गौं का।

कुकुरु मूं कबास यख बंदरों मूं नर्यूळ
आम टटमरा ह्वयां तिमला नी पक्यूळ
तौंकि पुंगड़्यों कूल हमरि रूड़ च पड़ीं 
सरकारि खजनै कि बांठि छिन बणी।

महलों अजगर हमरा भितरों छिन गुरौ
सूखु पड़ी संगति दिदा अब त ना झुरौ
गाजि-पाति मनखि डाळा ब्वटळा थूसणा
क्वे भक्वर्दा आम हमुतैं ढेला चुसौणा।

लोखों नि बरगलौंदा लोण तेल पुगौंदा
खालि अपड़ि नी कबरि हमरि हमरि बी स्वचदा
हमुन ल्वे बगै त तुमुन सोची रंग च
तुम पर त चढ़्यूं सदानि राजरंग च।

कबरि हम सणी बि राज भाषा बिंगौंदा
शिकार तुमू खांदा हमुतैं बास सुंघौंदा
दिन हमरा बि ठ्यलेणा छिन सस्ये सस्येक
चुनौं का बगत छां ठाठ दिन द्वियेक।

अब त ना तिबार सजीं खोळि चमकणी
सल्यों कि कळजुग मा क्वैई गिण्ति नी
म्वारा रिटदा खंद्वरों रोंदा सौत बणदै नी
चकड़ेतों अड्यौण वळों का पसिना छूटीनी।