भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मुझे बाहर निकलने दो / रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पड़ा मैं बन्द जीवन में, मुझे बाहर निकलने दो ।

नया संसार बनता है, नए आधार जिसके सब
नए युग की सजी वेदी, मिलेगा पर्व ऐसा कब ?
खड़ा ललकारता मनुजत्व मेरा, क्यों रुकूँगा तब ?
मिला दूँ तार मन का ज्योति के जलते शिखर से अब ।

पड़ा मैं बन्द जीवन में, मुझे बाहर निकलने दो ।

निकलने क्यों न दोगे ? तोड़ डालूँगा सभी बन्धन
न बन्दिश में रहेगा हथकड़ी-बेड़ी-कसा यह तन ।
मुझे जनता बुलाती है, बुलाता काल-परिवर्तन
बुलाता है मुझे भवितव्य का सुन्दर सुखी जीवन ।

पड़ा मैं बन्द जीवन में, मुझे बाहर निकलने दो ।