भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मुनिया की शताब्दी / समीर बरन नन्दी

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:45, 17 मई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=समीर बरन नन्दी |संग्रह= }} {{KKCatKavita‎}} <poem> खुल जाते है द…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खुल जाते है दरवाज़े ।
एक सीढ़ी साँप की तरह चल पड़ी है
एक पत्थर कारखाने में बदल गया है
एक तिनका, चिड़िया बन आकाश में उड़ रहा है ।

एक ओर दौड़ पड़ी हैं दूब की कतारें
रोटी से भर रहे है - ताल-तलैया
गाँव का कटा हाथ काम पर लग गया है
चल पड़ा है - कंकाल ।

चौड़े हो रहे हैं नौज़वानों के कन्धे
चाल में तलवार की चमकार
आखिरी ज़ंजीर कोई टूट गई है |

मुँह बा रही है दुनिया -
स्कूल जा रही है - मुनिया ।