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मुस्तक़बिल / हबीब जालिब
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मुस्तक़बिल[1]
तेरे लिए मैं क्या-क्या सदमे सहता हूँ
संगीनों के राज में भी सच कहता हूँ
मेरी राह में मस्लहतों के फूल भी हैं
तेरी ख़ातिर काँटे चुनता रहता हूँ
तू आएगा इसी आस में झूम रहा है दिल
देख ऐ मुस्तक़बिल ।
इक-इक करके सारे साथी छोड़ गए
मुझसे मेरे रहबर भी मुँह मोड़ गए
सोचता हूँ बेकार गिला है ग़ैरों का
अपने ही जब प्यार का नाता तोड़ गए
तेरे दुश्मन हैं मेरे ख़्वाबों के क़ातिल
देख ऐ मुस्तक़बिल ।
जेहल के आगे सर न झुकाया मैंने कभी
सिफ़्लों[2] को अपना न बनाया मैंने कभी
दौलत और ओहदों के बल पर जो ऐंठें
उन लोगों को मुँह न लगाया मैंने कभी
मैंने चोर कहा चोरों को खुलके सरे महफ़िल
देख ऐ मुस्तक़बिल ।
शब्दार्थ: