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मुहब्बत टूट कर करता हूँ, पर अंधा नहीं बनता / डी. एम. मिश्र

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मुहब्बत टूट कर करता हूँ, पर अंधा नहीं बनता
ख़ुदा से भी मैं अपने प्यार एकतरफ़ा नही करता।

चलो अच्छा हुआ जो झूठ पर से उठ गया परदा
वो मेरा हो नही सकता , मै उसका हो नहीं सकता।

हज़ारों साल की सब दुश्मनी मैं भूल जाता हूँ
गले लगता हूँ तो दिल में कोई दूरी नहीं रखता।

भले सैयाद है फिर भी कही उसके भी दिल होगा
उसे भी कील चुभती है किसी का पंख जब कटता।

मेरे क़ातिल तलक मेरा कोई पैग़ाम पहुँचा दे
लहू आँखों से जब टपके तो फिर आँसू नहीं बहता।

दिखे नन्हीं -सी चिनगारी घरों में आग लग जाती
तुम्हें मालूम होगा क्यों चिराग़ों से धुआँ उठता ।