भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मैं तुम्हें जलने न दूँगी / उर्मिल सत्यभूषण

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं तुम्हें जलने न दूँगी
खुदकुशी करने न दूँगी
तुम पटकती शीश बारम्बार
तोड़ने को लौह की दीवार
माथ यह फटने न दूँगी
मान तब घटने न दूँगी
क्यों हुई जलने को तत्पर
जिं़दगी के श्वेत पट पर
कालिमा मलने न दूँगी
मैं तुम्हें जलने न दूँगी
सामने अरिदल खड़ा तैयार
तुम निहत्थी, पर करेगा वार
इस तरह लड़ने न दूँगी
आगे यूँ बढ़ने न दूँगी
यह अकेली साधना बेकार
रोक लूंगी आग के इस पार
आग को डसने न दूँगी
ज्वाल में फंसने न दूँगी
मैं खड़ी हूँ आज तेरे साथ
और कितने उठ रहे हैं हाथ
हाथ मैं मलने न दूँगी
मोम सा गलने न दूँगी।