भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

यदि तू कभी इस अरण्य में आयेगा, / गुलाब खंडेलवाल

Kavita Kosh से
Vibhajhalani (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:08, 20 अप्रैल 2017 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यदि तू कभी इस अरण्य में आयेगा,
तो यहाँ हर पेड़ के तने पर
अपना ही नाम खुदा हुआ पायेगा.
डाल पर बैठी हुई मैना भी
रो- रोकर तुझे बुलायेगी,
और उड़-उड़कर तुझे वे टीले
और घाटियाँ दिखायेगी
जहाँ मैं थका-हारा सो जाता था,
क्षण भर को तेरी कल्पनाओं में खो जाता था.
यद्यपि वायु-लहरियों से मेरे पद-चिह्न मिट चुके होंगे,
किन्तु तुझे वे रक्त-रंजित काँटें अवश्य दिखाई देंगे
जो मेरी पीड़ा के साक्षी रहे हैं,
वे नि:शब्द शिलायें अवश्य मिलेंगी
जिन पर मेरी आँखों के आँसू बहे हैं.