भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

ये दलितों की बस्ती है ... / सूरजपाल चौहान

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बोतल महँगी है तो क्या,
थैली बहुत ही सस्ती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

ब्रह्मा विष्णु इनके घर में,
क़दम-क़दम पर जय श्रीराम ।
रात जगाते शेरोंवाली की …
करते कथा सत्यनाराण..।
पुरखों को जिसने मारा था,
उनकी ही कैसिट बजती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।
 
तू चूहड़ा और मैं चमार हूँ,
ये खटीक और वो कोली ।
एक तो हम कभी हो ना पाए,
बन गई जगह-जगह टोली ।
अपने मुक्तिदाता को भूले,
गैरों की झाँकी सजती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

हर महीने वृन्दावन दौड़े,
माता वैष्णो छह-छह बार ।
गुडगाँवा की जात लगाता,
सोमनाथ को अब तैयार ।
बेटी इसकी चार साल से,
दसवीं में ही पढ़ती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

बेटा बजरँगी दल में है,
बाप बना भगवाधारी
भैया हिन्दू परिषद में है,
बीजेपी में महतारी ।
मन्दिर-मस्जिद में गोली,
इनके कन्धे से चलती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

शुक्रवार को चौंसर बढ़ती,
सोमवार को मुख लहरी ।
विलियम पीती मंगलवार को,
शनिवार को नित ज़हरी ।
नौ दुर्गे में इसी बस्ती में,
घर-घर ढोलक बजती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

नकली बौद्धों की भी सुन लो,
कथनी करनी में अन्तर ।
बात करें हैं बौद्ध धम्म की,
घर में पढ़ें वेद मन्तर ।
बाबा साहेब की तस्वीर लगाते,
इनकी मैया मरती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

औरों के त्यौहार मनाकर,
व्यर्थ ख़ुशी मनाते हैं ।
हत्यारों को ईश मानकर,
गीत उन्हीं के गाते है ।
चौदह अप्रैल को बाबा साहेब की जयन्ती,
याद ना इनको रहती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

डोरीलाल है इसी बस्ती का,
कोटे से अफ़सर बन बैठा।
उसको इनकी क्या चिन्ता अब,
दूजों में घुसकर जा बैठा ।
बेटा पढ़कर शर्माजी, और
बेटी बनी अवस्थी है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

भूल गए अपने पुरखों को,
महामही इन्हें याद नहीं ।
अम्बेडकर, बिरसा , बुद्ध,
वीर ऊदल की याद नहीं ।
झलकारी को ये क्या जानें,
इनकी वह क्या लगती है ।
ये दलितो की बस्ती है ।।

मैं भी लिखना सीख गया हूँ,
गीत कहानी और कविता ।
इनके दु:ख दर्द की बातें,
मैं भी भला था, कहाँ लिखता ।
कैसे समझाऊँ अपने लोगों को ,
चिन्ता यही खटकती है ।
ये दलितों की बस्ती है।।