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"रचते हुए / सुकेश साहनी" के अवतरणों में अंतर

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या फिर
 
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धरती पर रेंगने वाला तुच्छ प्राणी
 
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गिरो
 
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उगो
 
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चट्टान पर बीज की तरह
 
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खिलो
 
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फूल की तरह
 
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मुर्दो में ज़िन्दा आदमी की तरह
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ठहरना अगर पड़े तो
 
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प्लेटफार्म पर सवारी गाड़ी की तरह
 
प्लेटफार्म पर सवारी गाड़ी की तरह
बरसों,बहो, गिरो, खिलो, चीख़ो, ठहरो
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भुरभुरा कर फिर आ मिलेगा
 
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तुम्हारे संग
 
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03:52, 29 अक्टूबर 2018 के समय का अवतरण

यूँ न देखो
हवा में उड़ रहे
उस पत्थर को
चाहे समझा करे वह
तुम्हें
अपना शत्रु
या फिर
धरती पर रेंगने वाला तुच्छ प्राणी
यूं देखते ही न रहो-
बरसो
बादल की तरह
बहो
नदी की तरह
गिरो
जल प्रपात की तरह
उगो
चट्टान पर बीज की तरह
खिलो
फूल की तरह
चीखो
मुर्दो में जिन्दा आदमी की तरह
ठहरना अगर पड़े तो
ठहरो
प्लेटफार्म पर सवारी गाड़ी की तरह
बरसों,बहो, गिरो, खिलो, चीखो, ठहरो
काला पत्थर
भुरभुरा कर फिर आ मिलेगा
मिट्टी की धारा से
रचने लगेगा
तुम्हारे संग
गेहूँ की बालियाँ