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राग-विराग से परे प्रेम / उर्मिल सत्यभूषण

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राग-विराग की
चक्की में पिस कर
पया है प्रेम को।
कुंदन बनाया है
मिलन और बिछोह
की भट्टी के ताप ने।
पाया है आत्ममोती
मंथन के तन-मन के-
पिलाया है अमृत
ज़हर के प्यालों ने
दंशित एहसासो
और अनबुझी प्यासों ने
तड़पा-तड़पा और
तरसा-तरसा कर
बनाया है योगी, रोगी
को, भोगी को
प्याला है प्रेम का
हाथ में अब उसके
निराला है अमृत
उस प्याले का-
जाती हूँ झूम-झूम
पिलाती हूँ सबको दो घूंट
जीवन की मधुशाला में
बिखराती हूँ आसव
उत्सव मनाती हूँ
हर पल पल-पल
मृत्यु का जीवन का।