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रेत / कविता वाचक्नवी

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रेत


बालू की धारियों का
सारा उन्माद
एकाएक उड़ जाता है
पाँवों की तली से
दरक जाती है लहरें
रेतीली,
छिन-छिन
छिनता है सारा
प्रवाह
धारा-प्रवाह।

धाराएँ रेत की
उडती हैं,
पड़ती हैं
अगले पडा़व पर।


थोडे़-से कण
पाँव के नीचे बची
लहर के,
कैसे सोखेगे
अनढँपी धरती की
आँखों में उभरी
काँटों की सिसकियाँ....?

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