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रॉकेटों और गीतों के दरमियाँ / भारत भूषण तिवारी / मार्टिन एस्पादा

आतिशबाजी आधी रात को शुरू हुई
हमारे घर के ऊपर के पेड़ों के गड़बड़झाले के बीच से सुसकारते
सुनहली चिंगारियाँ और रॉकेट

मुझे अपने बेटे को, जो जब बारह का है, यह सिद्ध कर दिखाना था
कि आसमान में कोई जंग नहीं छिड़ी है, यहाँ नहीं
इसलिए हम चल पडे़ रास्ते पर
वह जगह ढूँढने जहाँ आतिशबाजी शुरू हुई थी

हमने अपनी आँखों के आगे टहनियाँ झटककर दूर कीं,
ताकते रहे उस घर को जहाँ सुनहला उजाला
धुएँ में गर्क हो रहा था, वहाँ खामोशी थी

बर्फ का एक जहाँ, आखिरी कुछ चिंगारियों के साथ
फिर आवाजें उठीं, गाती हुई
और फिर जब पत्तियों से होकर गीत बरसा हम पर
हम सिमटे जरा पास, पेड़ों की मानिन्द

रॉकेट और गाने एक ही घर से, मेरे बेटे ने कहा
हम उस रास्ते पर पीछे को मुड़े
साल के अन्त में, साल की शुरूआत में
रॉंकेटों और गीतों के दरमियाँ कहीं