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लकीरें / त्रिपुरारि कुमार शर्मा

बहुत नाराज़ हैं नाज़ुक-सी ये रंगीन लकीरें
न तो आग़ाज़ है इनका नही अंज़ाम है कोई
ये यतीम भी नहीं हैं और न नाम है कोई
कितनी खुशरंग, खुबसूरत, खुशबूदार-सी हैं
जिन हाथों ने इनको प्यार से पैदा किया है
वो अंगुलियाँ इस बात से अंजान होंगी
हज़ारों शक्ल-सी इनमें उभरती-डूबती हैं
कुछ माज़ी, कुछ हाल, कुछ मुस्तक़बिल
जैसे बहता रहता है वक़्त का दरिया
किसी अफ़साने के दरीचे की मानिंद
उस टूटते-बिखरते हुए लम्हे की जानिब
जिसे मालूम है दर्द-ओ-अलम अपना
कहाँ जाए वो लेकर सारा ग़म अपना
उसकी आह का दुनिया में कोई तर्जुमा नहीं
ज़रा ग़ौर से देखो तो सारी चीखती हैं
बहुत नाराज़ हैं नाज़ुक-सी ये रंगीन लकीरें