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लगी है आग हवाओं से बात करता है / विनय कुमार

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लगी है आग हवाओं से बात करता है।
मेरे जुनू का परिंदा उड़ान भरता है।

बुझी ज़मीन पर सूरज उतारने के लिए
हवा में राह बनाता हुआ गुज़रता है।

वो आईना भी बिखरता है टूटकर दिल सा
कि जिसको देखकर ऐ जिस्म तू संवरता है।

लहू लिये हो कि पानी लिए हो सीने में
कभी भी वक़्त का दरिया नहीं ठहरता है।

बिकाऊ कश्तियाँ ठंडे लहू की झीलों में
निगाह डालने में चांद तक सिहरता है।

उठी है लाश सुनहरी गली से फिर यारो
यहाँ गुलाब के कूचे में कौन मरता है।

उफ़क़ को देखकर दिल में ख़याल उठता है
कि जो है आसमाँ वह भी कहीं उतरता है।