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लौटना / गौरव पाण्डेय

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फूल!
बीज बनकर लौटते हैं
जड़ों की ओर लौटती हैं
पत्तियाँ/खाद बनकर...

तुम देखना
एक दिन ऐसे ही मैं भी लौटूँगा...