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वही व्यक्ति शिव होता है / डी. एम. मिश्र

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माटी को जो सोना बोले उस पर क्या कविता लिखना
बालू को चाँदी से तौले उस पर क्या कविता लिखना
सबसे ऊपर गाँव को रक्खे उस पर क्या कविता लिखना
गाँव के ही जो सपने देखे उस पर क्या कविता लिखना।

पाथर को ‘शिवमूरत’ समझे उस पर क्या कविता लिखना
सब में उसी की सूरत देखे उस पर क्या कविता लिखना
अंदर -बाहर एक तरह हो उस पर क्या कविता लिखना
समतल -समतल एक सतह हो उस पर क्या कविता लिखना।

धरती -सा जो अति विनम्र हो उस पर क्या कविता लिखना
अपने आप में जो समग्र हो उस पर क्या कविता लिखना
अम्बर -सा जो समद्रष्टा हो उस पर क्या कविता लिखना
इतना बड़ा जो खुद स्रष्टा हो उस पर क्या कविता लिखना।

कविता लिखो महीपतियों पर दुनिया वाले कहते हैं
या सुरलोक के अधिपतियों पर दुनिया वाले कहते हैं
या फिर किसी बड़ी हस्ती पर दुनिया वाले कहते हैं
या फिर छलक रही मस्ती पर दुनिया वाले कहते हैं।

पर,वो शायद भूल रहे हैं उलटी गंगा नहीं बहे
रचनाकार हमेशा ऐसे दरबारों से दूर रहे
कलम शस्त्र बनकर उठता है तब वो अच्छा लगता है
अस्त्र की तरह जब चलता है तब वो अच्छा लगता है।

लेखक का किरदार बड़ा हो तब वो अच्छा लगता है
देवदार की तरह खड़ा हो तब वो अच्छा लगता है
सिंधु की तरह लहराता हो तब वो अच्छा लगता है
व्योम की तरह छा जाता हो तब वो अच्छा लगता है।

भाषा का वो जादूगर हो तब वो अच्छा लगता है
भावों का गहरा सागर हो तब वो अच्छा लगता है
पर, वो इक आईना -सा हो तब वो अच्छा लगता है
बिल्कुल ‘शिवमूरत’ जैसा हो तब वो अच्छा लगता है।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे तों सोया हुआ किसान उठे
दो धुर भूमि नहीं जिसके उसका भी सकल जहान उठे
‘शिवमूरत’ का कलम उठे तो सामन्तों का दुर्ग ढहे
‘विमली’ और ‘शनीचरी’ की आँखों से कभी न नीर बहे।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे ‘केशर -कस्तूरी’ महक उठे
‘लालू की माई’ की जीवन बगिया फिर से लहक उठे
‘सुरजी’ के उर की पीड़ा को ‘शिवमूरत’ ने शब्द दिया
‘पहलवान’ की असह्य ग्लानि भी मन ही मन में सहन किया।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे तों ‘रजपतिया’ को शक्ति मिले
व्यथित ‘पियारे’ को भी मानो ‘तर्पण’ करके मुक्ति मिले
शीश उठाकर जीना है तो असुरों से लड़ना होगा
कर में, धारणकर ‘त्रिशूल’ हम सबको शिव बनना होगा।

शिवमूरत’ का कलम उठे तो श्रमिकों का सम्मान बढ़े
 ‘कुच्ची का कानून ’ बने तो महिलाओं की शान बढे
 सत्ता के गलियारे में लहराये ‘जग्गू’ का परचम
 जो था कभी ‘कसाई ठाकुर’ अब उसमें रह गया न दम।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे तो ‘ज्ञान’ न यों ठोकर खाये
 जो समाज का दुश्मन है मैदान छोड़कर हट जाये
 ‘शिवमूरत’ का कलम उठे तो एक नया परिवर्तन हो
 आपस का सद्भाव बढे, खुशहाल सभी का जीवन हो।

 ‘शिवमूरत’ की रचनाएँ इसलिए सराही जाती हैं
 वर्तमान के साथ-साथ वो कल के स्वप्न सजाती हैं
 बोली - बानी की भाषा अद्भुत मिठास से भर देती
 मस्त हवा भी अपना आँचल खुशबू से तर कर लेती।

 ‘शिवमूरत’ नें शुष्क विटप में भी चेतनता लायी है
 ‘शिवमूरत’ नें आँधी को भी लेकिन दिशा दिखायी है
 मजलूमों के हक में उनकी जंग निरन्तर जारी है
 एक मोरचा फतह हुआ तो अगले की तैयारी है।

 कवि ‘कुरंग’ की उर्बरता के आगे शीश झुकाता है
 सृजन जहाँ अॅगडाई ले साहित्य-धाम बन जाता है
 कवि उसको ही नमन करे जो सबको राह दिखाता है
 करता है आसान सफर जो मंजिल तक ले जाता है।

 कालजयी जो होता है उसका अवसान नहीं होता
 राज दिलों पर करता है जो उसका अंत कहीं होता
 कोई पुष्प बिछाता चलता, कोई काँटे बोता है
 बढ़कर गरल उठा लेता जो व्यक्ति वही शिव होता है।