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शत शत नमन / उर्मिल सत्यभूषण

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हे महादेवी! तुम्हें शत शत नमन
तिमिर पारावार में आलोक प्रतिभा सी खिलीं तुम
दर्द की गाथा कही संवेदनाओं में मिलीं तुम
मोतियों की हाट और चिंगारियों का एक मेला
स्वप्न के संसार में बन सत्य ही नितनित ढली तुम
हे महागाथा! तुम्हें शत शत नमन!
भावना के मचलते निर्झर सी छायावादिनी तुम
सृष्टि के अनबूझ भेदों सी रहस्यवादिनी तुम
दिवस के अवसान पर थी झिलमिलाती यामिनी सी
दूर रहकर भी प्रिय से, थीं अखंड सुहागिनी तुम
हे महामाया! तुम्हें शत शत नमन
देखने को तुम लालायित क्षितिज के उस पार क्या है
शोध थी तेरी कि देखूं सृष्टि का आधार क्या है
पीर में ढूँढ़ा तो पाया प्यास क्या है, प्यार क्या है
प्रेम का आलोक क्या है ज्योति पारावार क्या है
हे अलौकिक प्रेमिका! शत शत नमन
वेदनाओं की धरा पर इक त्रिवेणी सी बही थी
लोचनों में प्यास ले रसधार की गाथा कही थी
तुम बनी संजीवनी, कविता, कला तरंगिणी तुम
घोर तम में, पीर में भी रोशनी की बांह गही थी
आलोक प्रतिमा हे! तुम्हें शत शत नमन।