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शोडष प्रकरण / श्लोक 1-11 / मृदुल कीर्ति

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अष्टावक्र उवाचः
बहु भांति बहु शास्त्रीय अध्ययन , और कथन करते रहे,
पर विस्मरण इनका किए बिन, शान्ति न कतिपय अहे.-----१

तेरा कर्म, भोग समाधि में, यदि चित्त भी उन्मुख रहे,
यदि मूल में निष्काम, विज्ञ के ब्रह्म तो सन्मुख अहे.-------२

हैं क्लांत श्रम से जीव सब, इसको नहीं कोई जानता,
यह ज्ञान गम्य, हैं धन्य जो इस मर्म को पहचानता.------३

चक्षुओं के खोलने और बंद से भी जो दुःखी,
उस शिरोमणि आलसी को कौन कर सकता सुखी.------४

कृत और अकृत के द्वंद से, मन मुक्त हो तब मुक्ति है,
धन, अर्थ, मोक्ष और काम इच्छा, शून्यता ही युक्ति है.-----५

विषय का द्वेषी विरत है, विषयलोलुप लिप्त है,
त्याग और ग्रहण से जो परे, जन सर्वथा निर्लिप्त हैं.------६

जब तक है तृष्णा अविवेकी, भाव रहता समूल है,
त्याग और ग्रहण की भावना संसार वृक्ष का मूल है.------७

राग में प्रवृति, निवृति में द्वेष, भाव का दोष है,
धी, मान, जन, निर्द्वंद, सम बालक व्यवहृत निर्दोष है.------८

दुःख निवृति के लिए, जग त्याग रागी की चाह है,
पर वीतरागी जग में भी, सुख शान्ति पाता अथाह है.------९

अभिमान जिसको मोक्ष का, और देह ममता सक्त है,
ज्ञानी और योगी नहीं, बस दुःख भोगी अशक्त है.--------१०

यदि ब्रह्मा, विष्णु शिव तेरे, उपदेश कर्ता भी रहें,
तो भी बिना विस्मृति के, बिन त्याग न शान्ति अहे.------११