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शौक़े-दीदारे-रूखे-यार करूँ या न करूँ / कांतिमोहन 'सोज़'

नज़्रे-फ़ैज़

शौक़े-दीदारे-रूखे-यार करूँ या न करूँ ।
हसरते-हासिले-अफ़्कार करूँ या न करूँ ।।

शिकवए-तल्ख़िए-अदवार करूँ या न करूँ ।
शेर को वक़्त की गुफ़्तार करूँ या न करूँ ।।

जाम-दर-जाम हलाहल युँही पीता जाऊँ
महफ़िले-यार में तकरार करूँ या न करूँ ।

सतवते-जाबिरो-ज़ालिम की सियहमस्ती में
अज़मते-इश्क़ का इज़हार करूँ या न करूँ ।

है अजब हाल कि नाक़ूस है पेशोपस में
ग़ाफ़िले-ख़्वाब को बेदार करूँ या न करूँ ।

वो जो हर ज़ुल्फ़ को सर करने पे आमादा हैं
उन हवाओं को गिरफ़तार करूँ या न करूँ ।

नूर का तायरे-नौरस अभी इस सोच में है
कोहे-ज़ुल्मात पे यलग़ार करूँ या न करूँ ।

गोया इस सोच में डूबी है ग़ज़ल की कश्ती
दिल के दरिया को अभी पार करूँ या न करूँ ।

फिर वही हर्फ़े-जनूं सोज़ को लिखता है सलाम
दावते-नाज़ से इनकार करूँ या न करूँ ।।

7-3-1985